Friday, February 27, 2026
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सागौन जब्ती कार्रवाई पर उठे सवाल:पहले घर में पहुंची लकड़ी,मुखबिर की सूचना पर कार्यवाही हुई,अब अपनी ही पीठ थपथपाने में लगे

सागौन जब्ती कार्रवाई पर उठे सवाल:पहले घर में पहुंची लकड़ी,मुखबिर की सूचना पर कार्यवाही हुई,अब अपनी ही पीठ थपथपाने में लगे

प्रेस नोट में भी गड़बड़ी के आरोप

बैतूल। दक्षिण वन मंडल में अवैध सागौन जब्ती की कार्रवाई को लेकर अब कई सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि पहले अवैध सागौन घर के भीतर पहुंचाई गई और बाद में मुखबिर की सूचना पर कार्रवाई दिखाकर विभागीय अधिकारी अपनी ही पीठ थपथपाने में जुट गए। इतना ही नहीं, कार्रवाई के दो दिन बाद जारी प्रेस नोट में भी कई महत्वपूर्ण तथ्यों का उल्लेख नहीं किया गया, जिससे पूरे मामले में संदेह और गहरा गया है।
जानकारी के अनुसार बुधवार दोपहर दक्षिण वन मंडल के डीएफओ अरिहंत कोचर को मुखबिर से सूचना मिली थी कि ताप्ती रेंज के महुपानी सर्किल अंतर्गत ग्राम गोनीघाट में एक घर में अवैध रूप से सागौन की लकड़ी रखी हुई है। सूचना के आधार पर वन विभाग की टीम ने जयराम यादव के घर पर दबिश दी, जहां अवैध रूप से फर्नीचर निर्माण का कार्य किया जा रहा था। मौके से 45 नग सागौन चिरान कुल 0.431 घन मीटर लकड़ी जब्त की गई।
हालांकि इस पूरी कार्रवाई को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं। आरोप है कि मैदानी अमला अपने किसी खास व्यक्ति के यहां अवैध सागौन पहुंचवाता है और बाद में कार्रवाई दिखाकर वाहवाही लूटने की कोशिश करता है।
जप्त काष्ठ में लठ्ठों का नहीं किया उल्लेख
वन विभाग द्वारा जारी प्रेस नोट में 45 नग सागौन चिरान का जिक्र किया गया है, लेकिन मौके पर मौजूद रहे लोगों का कहना है कि कार्रवाई के दौरान तीन सागौन लठ्ठे भी मौजूद थे। हैरानी की बात यह है कि जारी प्रेस नोट में इन तीन लठ्ठों का कोई उल्लेख नहीं किया गया।
अब सवाल यह उठ रहा है कि ये तीन सागौन लठ्ठे आखिर कहां गए और किसके कहने पर उन्हें रिकॉर्ड से गायब किया गया। यह पूरा मामला जांच का विषय बन गया है।
दो अलग-अलग अधिनियमों में दर्ज किया गया प्रकरण
वन विभाग ने जयराम यादव के खिलाफ पीओआर क्रमांक 266/45 दर्ज किया है। यह प्रकरण भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा 26(1)क तथा मध्य प्रदेश वन उपज व्यापार विनिमय अधिनियम 1969 की धारा 5(1) के तहत कायम किया गया है। विभाग का कहना है कि अवैध रूप से वन उपज का उपयोग और व्यापार करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
कार्रवाई करने वाली टीम के नाम ही गायब
इस पूरे मामले में एक और बड़ा सवाल यह भी खड़ा हो रहा है कि जिस टीम को डीएफओ द्वारा कार्रवाई की जिम्मेदारी दी गई थी, उसी टीम के नाम प्रेस नोट से गायब कर दिए गए।
जानकारी के मुताबिक इस कार्रवाई में आमला रेंज के राजेंद्र मोखलगाय, देवेंद्र ठाकुर, दिनेश धुर्वे, यशवंत चौहान और ड्राइवर ओमप्रकाश परते को मुख्य छापेमार कार्रवाई की जिम्मेदारी दी गई थी।
लेकिन जारी प्रेस नोट में इनका नाम शामिल नहीं किया गया और कार्रवाई का श्रेय अन्य अधिकारियों को दिया गया। प्रेस नोट में रेंज ऑफिसर दयानंद डेहरिया, ओंकारनाथ मालवीय, रमेश मस्की, परिक्षेत्र सहायक, भैयालाल कुमरे, कामुलाल इवने, दीप्ति राजपूत और सोनू पुंडे की भूमिका बताई गई है।
अब इस पूरे मामले में विभागीय पारदर्शिता और कार्रवाई की वास्तविकता पर सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए ताकि सच्चाई सामने आ सके।

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